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My professor is my sugar daddy

रॉयल एम्पायर यूनिवर्सिटी का नाम सुनते ही शहर के बड़े-बड़े रईसों के बच्चों के पसीने छूट जाते थे, और उसकी सबसे बड़ी वजह थे वहाँ के ज़ूलॉजी डिपार्टमेंट के हेड—प्रोफ़ेसर कुणाल मल्होत्रा। 33 साल की उम्र में कुणाल का रसूख ऐसा था कि उनके क्लास में कदम रखते ही सन्नाटा छा जाता था। तीखे नैन-नक़्श, गठीला शरीर, आँखों में बेइंतहा ठंडक और चेहरे पर हर वक़्त छाई रहने वाली बेरुखी। उनकी पर्सनालिटी जितनी शानदार थी, उनका मिज़ाज उतना ही ख़तरनाक। लेकिन उन सबसे ज़्यादा ख़ौफ़नाक थी उनके हाथ में रहने वाली वो शीशम की काली छड़ी (stick)। जब भी कुणाल अपनी क्लास में उस छड़ी की टप-टप आवाज़ करते हुए घूमते, तो हर स्टूडेंट की धड़कनें रुक सी जाती थीं।



लेकिन उस पूरे महकमे में एक लड़की ऐसी थी, जिसकी आँखों में डर का नामो-निशान तक नहीं था—20 साल की सृष्टि शर्मा।

सृष्टि—मासूम चेहरा, आँखों में बेइंतहा चंचलता, गालों पर पड़ने वाले छोटे से डिंपल और बेपरवाह मिज़ाज वाली बी.एससी. ज़ूलॉजी की  स्टूडेंट। जहाँ पूरी यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर मल्होत्रा के गठे हुए शरीर, भारी आवाज़ और उनकी छड़ी से कांपती थी, वहीं सृष्टि का दिल उन्हें देखकर एक अलग ही धड़कन में धड़कने लगता था।

आख़िरकार, वही कड़क प्रोफ़ेसर बंद कमरों के पीछे उसके 'शुगर डैडी' जो थे। दोनों का यह रिश्ता दुनिया की नज़रों से एक गहरा और ख़तरनाक राज़ था।

सुबह के 10 बज रहे थे। एम्फीथिएटर वाले बड़े से लेक्चर हॉल में सन्नाटा पसरा हुआ था। कुणाल पोडियम पर खड़े होकर ज़ूलॉजी का एक बेहद जटिल लेक्चर दे रहे थे। उनके हाथ में वही काली छड़ी थी, जिससे वे समय-समय पर बोर्ड पर प्वाइंट्स को इंडिकेट कर रहे थे।

"एनिमल बिहेवियर और डोमिनेंस हियरार्की में सबसे अहम बात यह होती है कि जो शक्तिशाली है, वही नियम तय करता है..." कुणाल की भारी और ठंडी आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी।

उनकी निगाहें घूमते-घूमते आख़िरी रो में बैठी सृष्टि पर जाकर रुक गईं। सृष्टि अपनी थोड़ी पर हाथ टिकाए, बिना पलक झपकाए सिर्फ़ कुणाल के होंठों और उनकी चौड़ी छाती को घूर रही थी। उसके चेहरे पर एक शरारती और नटखट सी मुस्कान थी।

कुणाल ने अपनी छड़ी को हाथ में थोड़ा कसा। वे जानते थे कि सृष्टि का ध्यान पढ़ाई पर नहीं, बल्कि उन पर है।

"मिस सृष्टि शर्मा!" कुणाल की कड़क आवाज़ गूँजी।

सृष्टि अचानक चौंक गई, लेकिन फिर भी उसके चेहरे का सुकून वैसा ही रहा। "जी, प्रोफ़ेसर?"

"क्या आप क्लास को समझा सकती हैं कि मैंने अभी डोमिनेंस के बारे में क्या कहा? या आपका ध्यान कहीं और भटक रहा है?" कुणाल ने अपनी गहरी काली आँखों से उसे घूरते हुए कहा।

सृष्टि धीरे से खड़ी हुई, अपनी 20 साल की ढीठ मासूमियत के साथ अपने बाल पीछे किए और आँखों में एक मादक चमक लिए बोली, "सर... आपने कहा कि जो शक्तिशाली होता है, नियम वही बनाता है। और अगर कोई उन नियमों को तोड़े... तो शक्तिशाली इंसान के पास सज़ा देने का पूरा हक़ होता है।"

सृष्टि के इस जवाब और उसके लहज़े में छिपे दोहरे मतलब को सिर्फ़ कुणाल समझ सकते थे। पूरी क्लास को लगा कि सृष्टि ने बिल्कुल सही जवाब दिया है, लेकिन कुणाल के चेहरे की तल्खी और बढ़ गई।

"बैठ जाइए," कुणाल ने रूखेपन से कहा। "और याद दिला दूँ, आज आपके असाइनमेंट सबमिशन की आख़िरी तारीख़ है।"

लेक्चर ख़त्म होते ही कुणाल अपनी भारी मेज़ के पीछे बैठ गए। "सब लोग अपने असाइनमेंट्स मेरी मेज़ पर रखकर बाहर जा सकते हैं।"

एक-एक करके सारे स्टूडेंट्स डरते-डरते अपनी फाइल्स टेबल पर रखने लगे। सृष्टि भी अपनी फाइल लेकर लाइन में खड़ी हो गई। जब उसकी बारी आई, तो उसने अपनी फाइल कुणाल के सामने रखी।

कुणाल ने फाइल उठाई, उसे खोला और एक नज़र देखते ही बंद कर दी। उनके चेहरे के भाव पल भर में और ज़्यादा कठोर हो गए।

उन्होंने अपनी शीशम की छड़ी उठाई और अपनी हथेली पर हल्के से मारते हुए उसकी सतह को सहलाने लगे।

थप... थप... थप... छड़ी की उस हल्की सी आवाज़ ने पूरी क्लास के अंदर एक सिहरन पैदा कर दी। सब अपने कदम रोककर वहीं थम गए।

"सृष्टि शर्मा..." कुणाल की भारी आवाज़ सन्नाटे को चीरती हुई गूँजी। "मैंने 20 पन्नों का विस्तृत असाइनमेंट माँगा था। आपकी इस फाइल में सिर्फ़ 5 पन्ने हैं। वो भी आधे-अधूरे।"

सबकी जान हलक में आ गई। सब मन ही मन सोचने लगे कि आज तो सृष्टि की ख़ैर नहीं।

"सर... वो... मुझे रात को वक़्त नहीं मिला," सृष्टि ने सिर झुकाकर बेहद मासूमियत का नाटक किया।

कुणाल ने अपनी छड़ी को ज़ोर से  मारा—चटाक!

आवाज़ से हॉल में खड़े हर स्टूडेंट का कलेजा कांप उठा। कुणाल अपनी कुर्सी से उठे, सृष्टि के बेहद करीब आए और नीची, भारी आवाज़ में बोले, "मेरी क्लास में कामचोरी की कोई जगह नहीं है। मुझे बहाने पसंद नहीं हैं, मिस शर्मा।"

"सॉरी सर..." सृष्टि ने धीमी आवाज़ में कहा, लेकिन उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था।

"सॉरी से काम नहीं चलेगा," कुणाल ने छड़ी का सिरा सृष्टि की ठुड्डी (chin) के नीचे रखा और उसका चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया। "क्लास ख़त्म हो चुकी है। अब सीधे मेरे प्राइवेट केबिन में आओ। तुमने जो गुस्ताख़ी की है, उसकी भरपाई तुम्हें वहीं करनी होगी। तुम्हारी सज़ा वहीं तय होगी।"

पूरी क्लास के पसीने छूट गए। सबको लगा कि आज प्रोफ़ेसर कुणाल सृष्टि को या तो यूनिवर्सिटी से सस्पेंड कर देंगे या फिर कोई बहुत कठोर सज़ा देंगे।

"जी सर... मैं आती हूँ," सृष्टि ने कहा।

लेकिन जैसे ही कुणाल छड़ी हाथ में लिए केबिन की तरफ़ मुड़े, सृष्टि के होंठों पर एक गहरी, शरारती और आशिक़ाना मुस्कान तैर गई। उसकी बांछें खिल चुकी थीं।

सज़ा? उसे अच्छी तरह मालूम था कि बंद दरवाज़ों के पीछे उसके 'शुगर डैडी' उसे क्या सज़ा देने वाले थे। जिस सज़ा के ख़याल से पूरी यूनिवर्सिटी कांपती थी, उसी सज़ा का मज़ा लेने के लिए सृष्टि का 20 साल का चंचल दिल बेकाबू हो रहा था।

जैसे ही सृष्टि केबिन की तरफ़ बढ़ने लगी, उसकी दोस्त ने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया, "सृष्टि, तू पागल है क्या? देख नहीं रही सर का गॉडज़िला जैसा मूड है! छड़ी देखी उनकी? आज वो तुझे कच्चा चबा जाएँगे! केबिन में मत जा, principal से शिकायत कर दे!"

सृष्टि  अपनी दोस्त ko बोली, "don't worry I'll manage..."

और इतना कहकर सृष्टि धीमी, इठलाती चाल से प्रोफ़ेसर कुणाल मल्होत्रा के केबिन

के बंद दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई... जहाँ सज़ा, अधिकार और बेपनाह जुनून का एक नया खेल उसका इंतज़ार कर रहा था।

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Sakuntala Koiry

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"By day, I crunch numbers. By night, I craft darkness. Meet Sakuntala Koiry , teacher, and dark romance author, where shadows meet seduction." Meri stories meri khud ki likhi hui hai please ise koi copy na kare..

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