रॉयल एम्पायर यूनिवर्सिटी का कॉरिडोर पूरी तरह से ख़ाली हो चुका था। शाम ढल रही थी और ज़ूलॉजी डिपार्टमेंट के उस लंबे रास्ते पर सृष्टि की सैंडल की 'टिप-टॉप' आवाज़ गूँज रही थी। सृष्टि प्रोफ़ेसर कुणाल मल्होत्रा के केबिन के दरवाज़े के सामने आकर रुक गई।
दरवाज़े पर लगी नेमप्लेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—'प्रोफ़ेसर कुणाल मल्होत्रा, हेड ऑफ़ ज़ूलॉजी'।
सृष्टि ने एक लंबी साँस ली, अपने कपड़ों को थोड़ा ठीक किया, अपनी नटखट मुस्कान को वापस चेहरे पर लाया और दरवाज़े पर दो बार दस्तक दी।
"कम इन," अंदर से कुणाल की भारी और कड़क आवाज़ आई।
सृष्टि ने आहिस्ते से दरवाज़ा खोला और अंदर दाखिल होकर उसे पीछे से लॉक कर दिया। खटक!
ताले की उस आवाज़ के साथ ही कमरे का माहौल पूरी तरह बदल गया। बाहर का प्रोफ़ेसर और स्टूडेंट का रिश्ता जैसे उस दरवाज़े के बाहर ही छूट गया था।
कमरे में मद्धम रोशनी थी। एयर कंडीशनर की ठंडी हवा चल रही थी और हवा में कुणाल के महंगे वुडी परफ्यूम की तेज़ ख़ुशबू फैली हुई थी। कुणाल अपनी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे हुए थे। उनका कोट उतरा हुआ था, शर्ट की ऊपर की दो बटन खुली थीं और आस्तीनें कोहनियों तक मुड़ी हुई थीं, जिससे उनके गठे हुए हाथ साफ़ दिख रहे थे। उनकी वही शीशम की काली छड़ी मेज़ पर रखी हुई थी।
सृष्टि दबे पाँव चलकर उनकी मेज़ के पास पहुँची और मासूमियत से बोली, "सर... आपने बुलाया?"
कुणाल ने अपनी कुर्सी से टेक हटाई और अपनी गहरी, भूरी आँखों से सृष्टि को सिर से पैर तक घूरने लगे। सृष्टि उस वक़्त किसी हूर से कम नहीं लग रही थी—मासूम चेहरा, लेकिन आँखों में ज़माने भर की शरारत।
"मिस शर्मा..." कुणाल अपनी जगह से उठे। उनकी 6 फ़ीट से लंबी काठी सृष्टि के सामने आकर खड़ी हो गई। उन्होंने मेज़ पर रखी छड़ी उठाई और उसकी नोक को सृष्टि की ठोड़ी के नीचे रखकर उसका चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया।
"तुम्हें क्या लगा था? क्लास में मुझे अपने उस मासूम चेहरे से बेवकूफ़ बना लोगी?" कुणाल की आवाज़ अब कड़क तो थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी गर्माहट और हक़ छुपा हुआ था।
सृष्टि ने बिना डरे छड़ी की नोक पर अपनी उंगली फेरी और कुणाल की आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराई, "मैंने कोई बेवकूफ़ नहीं बनाया 'डैडी'... मुझे बस मालूम था कि अगर असाइनमेंट पूरा कर देती, तो मुझे आपके इस केबिन में अकेले आने का बहाना कैसे मिलता?"
कुणाल की भौंहें तन गईं। उन्होंने छड़ी को एक तरफ़ मेज़ पर फेंका—खट!—और एक ही झटके में सृष्टि की पतली कमर को पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींच लिया। दोनों के बीच का फ़ासला ज़ीरो हो गया। सृष्टि की छाती कुणाल के चौड़े सीने से जा टकराई।
"तुम्हारी यह बदमाशी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, सृष्टि," कुणाल ने उसके कान के पास झुककर नीची, भारी आवाज़ में कहा। उनकी गर्म साँसें सृष्टि की गर्दन पर पड़ रही थीं, जिससे सृष्टि के रोंगटे खड़े हो गए।
"यूनिवर्सिटी का हर स्टूडेंट मुझसे थर-थर कांपता है, और तुम... तुम मेरी ही क्लास में बैठकर मुझे ताकती हो?"
सृष्टि ने अपने दोनों हाथ कुणाल की गर्दन में डाल दिए और इठलाते हुए बोली, "क्योंकि वो बेवकूफ़ हैं डैडी... उन्हें सिर्फ़ आपकी ये छड़ी दिखती है। मुझे तो ये मालूम है कि इस कड़क प्रोफ़ेसर के पीछे मेरा वो 'शुगर डैडी' छुपा है जो मुझसे बेइंतहा प्यार करता है।"
कुणाल के कठोर चेहरे पर एक हल्की, कातिलाना मुस्कान उभरी। उन्होंने सृष्टि के निचले होंठ को अपने अँगूठे से सहलाया, "लेकिन आज तुमने नियम तोड़ा है।
आधे-अधूरे 5 पन्नों का असाइनमेंट? इसकी सज़ा तो तुम्हें भुगतनी ही पड़ेगी।"
"ओह वाकई?" सृष्टि ने अपनी आँखें मटकाते हुए कहा। "तो क्या सज़ा देने वाले हैं आप मुझे, प्रोफ़ेसर मल्होत्रा? क्या आप मुझे रस्टिकेट करेंगे? या..." सृष्टि थोड़ा और करीब झुकी, "...मुझे पूरी रात इस केबिन में अपने पास कैद रखेंगे?"
कुणाल ने बिना एक पल गँवाए सृष्टि की पीठ पर हाथ टिकाया और उसे उठाकर अपनी भारी लकड़ी की मेज़ पर बैठा दिया। मेज़ पर रखी कुछ फाइलें नीचे गिर गईं, लेकिन दोनों में से किसी का ध्यान उस पर नहीं गया।
"रस्टिकेट करना बहुत आसान सज़ा होगी, मेरी जान," कुणाल ने सृष्टि की जाँघों के बीच अपनी जगह बनाई और उसके दोनों हाथों को मेज़ पर ऊपर करके पकड़ लिया। "तुम्हारी सज़ा यह है कि आज रात तुम इस केबिन से तब तक बाहर नहीं जाओगी, जब तक मैं तुम्हारा पूरा असाइनमेंट अपनी आँखों के सामने पूरा न करवा लूँ... और हर एक पन्ने की सज़ा तुम्हें अलग से मिलेगी।"
सृष्टि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। कुणाल के चेहरे का जुनून और उनका यह डोमिनेटिंग अंदाज़ सृष्टि को अंदर तक बहका रहा था।
कुणाल एक क्षण के लिए थोड़ा पीछे हटे। उनकी भारी साँसें अभी भी सृष्टि की गर्दन पर महसूस हो रही थीं। उन्होंने मेज़ पर फेंकी हुई काली शीशम की छड़ी फिर से उठा ली। छड़ी की ठंडी, चिकनी लकड़ी उनकी उँगलियों में समा गई।
उनकी गहरी भूरी आँखें सृष्टि पर टिकी रहीं—उसके मासूम चेहरे पर, उसके अधखुले होंठों पर, और उस शरारती चमक पर जो उसकी आँखों में नाच रही थी।
“स्कर्ट उ'ठाओ,” कुणाल की आवाज़ कम, भारी और हुक्म भरी थी। “और मेरे डेस्क पर… दोनों पाँ'व फै'लाकर बैठ जाओ।”



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