कुणाल की आँखों में एक गहरी, अँधेरी चमक तैर गई। उन्होंने छ"ड़ी को घुमाया और उसकी चिकनी, गोल नोक को सृष्टि की गी"ली संवेद'नशील जगह के प्रवेश द्वार पर टिका दिया। ठंडी लकड़ी का स्पर्श पाते ही सृष्टि की पूरी देह सिहर उठी।
“तो फिर… यहीं,” कुणाल ने धीरे से कहा। “आज तुम्हारी सज़ा सिर्फ़ थप्प*ड़ नहीं… आज तुम्हें मेरी छ"ड़ी से ही भर दिया जाएगा।”

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