कुछ पलों तक उस केबिन में सिवाय दोनों की मद्धम साँसों और एसी की हल्की सरसराहट के और कोई आवाज़ नहीं थी। कुणाल ने धीरे-धीरे खुद को सृष्टि से अलग किया। उनके चेहरे पर वह कड़क और डरावना प्रोफ़ेसर वाला रूप कहीं खो चुका था; उसकी जगह एक गहरी नरमी और अपनापन था।
कुणाल ने अपनी मेज़ की दराज से टिशू पेपर का पैकेट निकाला। उन्होंने बेहद प्यार और नाज़ुक अंदाज़ में पहले सृष्टि के संवेद'नशील हिस्सों को साफ किया, फिर अपने आप को पोंछा। उनका हर एक स्पर्श ऐसा था, जो कह रहा था कि यूनिवर्सिटी के उस ख़ौफ़नाक प्रोफ़ेसर के दिल में सृष्टि के लिए कितनी बेइंतहा मोहब्बत छिपी है। इसके बाद उन्होंने सृष्टि के बिखरे हुए कपड़े और उसकी स्कर्ट को ठीक किया, उसके बाल संवारे और उसका कॉलर ठीक करते हुए प्यार से उसके गाल पर एक थपकी दी।



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