कुणाल की जीभ अब और गहराई तक पहुँच चुकी थी। उन्होंने सृष्टि की दोनों टाँ'गों को अपने चौड़े कंधों पर और कसकर दबा रखा था। उनकी जीभ उसके भीगे हुए छेद के अंदर घुसकर दीवारों को चा'ट रही थी, जबकि दो उंगलियाँ धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो रही थीं। सृष्टि का शरीर हर छुअन पर सिहर उठता। उसकी उंगलियाँ कुणाल के घने बालों में धँसी हुई थीं और वह अपनी कमर को अनजाने में ऊपर उठा-उठाकर उनकी जीभ के और करीब आने की कोशिश कर रही थी।
“आह्ह… डैडी… और अंदर…please…” सृष्टि की आवाज़ काँप रही थी।

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