शाम के ठीक पाँच बजे, यूनिवर्सिटी की पार्किंग का वह सूना कोना एक बार फिर दोनों के मिलने का गवाह बना। कुणाल की काली एसयूवी हमेशा की तरह उसी जगह खड़ी थी। सृष्टि फुर्ती से आगे बढ़ी और बिना किसी झिझक के पैसेंजर सीट का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठ गई।
कार का दरवाज़ा बंद होते ही कुणाल ने बिना एक पल गँवाए उसे अपनी तरफ़ खींच लिया और उसके होंठों पर एक गहरा, भूखा और कसैला चुंबन जड़ दिया—मानो वे पूरे दिन एक-दूसरे से दूर रहने की सज़ा चुका रहे हों।
सृष्टि की साँसें उखड़ गईं। उसने अपनी उंगलियाँ कुणाल के बालों में फँसा लीं और हाँफते हुए बोली, "डैडी... अगर किसी ने देख लिया..."
"देखने दो..." कुणाल की आवाज़ भारी और मदहोश थी। उन्होंने उसके निचले होंठ को हल्के से अपने दाँतों के बीच दबाते हुए कहा, "कल और परसों दो दिन और... फिर अंडमान के उन जंगलों में सिर्फ तुम होगी और मेरा कमरा होगा। कोई बीच में नहीं आएगा।"
सृष्टि के चेहरे पर एक नटखट और चंचल मुस्कान बिखर गई।
18 सितंबर, 2026 — सुबह का वक़्त (रॉयल एम्पायर यूनिवर्सिटी परिसर)
दो दिन पलक झपकते ही बीत गए। 18 सितंबर की सुबह यूनिवर्सिटी का मेन गेट छात्रों की भीड़ और बड़े-बड़े सूटकेस-बैग्स से गुलज़ार था। फ़र्स्ट सेमेस्टर के सभी स्टूडेंट्स अपनी फील्ड स्टडी के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जाने वास्ते बसों में सवार होने के लिए जमा हो चुके थे।
सृष्टि ने आज सफर के लिहाज़ से एक बेहद कूल और स्टाइलिश लुक अपनाया था—एक ऑलिव ग्रीन कार्गो पैंट, स्लीवलेस ब्लैक टॉप और ऊपर से खुली हुई एक कैजुअल डेनिम जैकेट। उसके बाल पोनीटेल में बंधे थे और चेहरे पर एक अलग ही चमक थी।
कॉरिडोर में रिया और तान्या अपने भारी-भरकम लगेज के साथ बात कर रही थीं।
"यार, सच में विश्वास नहीं हो रहा कि हम अंडमान जा रहे हैं!" तान्या ने उत्साह से कहा। "और सबसे बड़ी बात, प्रोफ़ेसर मल्होत्रा खुद पूरी ट्रिप को लीड कर रहे हैं। भाई, थोड़ा बच के रहना पड़ेगा, उनका गुस्सा तो तू जानती ही है!"
रिया ने हँसते हुए कहा, "अरे हाँ भाई! केबिन वाला कांड कौन भूल सकता है। पर सच कहूँ तो वहाँ के बीच और समंदर के सामने उनका गुस्सा भी झेल लेंगे।"
तभी स्पीकर पर भारी आवाज़ गूँजी— "सभी छात्र ध्यान दें! प्रोफ़ेसर कुणाल मल्होत्रा डिपार्टमेंट के मेन गेट पर ब्रीफ़िंग के लिए पहुँच रहे हैं। सभी अपनी अटेंडेंस सुनिश्चित करें।"
अभी प्रोफ़ेसर कुणाल स्टूडेंट्स के सामने आते, उससे ठीक पहले उनकी जेब में रखा पर्सनल फोन लगातार बज उठा। स्क्रीन पर दादी का नाम चमक रहा था। कुणाल ने तुरंत साइड में हटकर कॉल रिसीव की।
"नमस्ते, दादी," कुणाल ने बड़े आदर और अपनेपन से कहा।
फोन के दूसरी तरफ से दादी की सख्त और मज़ाकिया आवाज़ गूँजी, "बेटा कुणाल, देखो, मैं पहले ही चेतावनी दे रही हूँ, उस शैतान शृष्टि का बहुत अच्छे से ख़्याल रखना! नादान है और थोड़ी जिद्दी भी, पता नहीं कब क्या शैतानी कर बैठेगी। इन घने जंगलों में ज़रा उसे अपनी आँखों के सामने ही रखना, वरना वो किसी मुसीबत में फँसने में एक सेकंड नहीं लगाएगी!"
दादी की इस बात पर कुणाल के चेहरे पर एक गहरी और आत्मीय मुस्कान तैर आई। उन्होंने बड़े भरोसे भरे और शांत स्वर में कहा, "आप बिल्कुल फ़िक्र मत कीजिए, दादी। मैं उसका पूरा ख़्याल रखूँगा। आप निश्चिंत रहिए।"
"चलो, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी," दादी ने चैन की साँस लेते हुए कहा, "चलो अब अपना काम करो, मैं तो बस ऐसे ही तसल्ली करने के लिए फ़ोन मिलाया था।"
कुणाल ने मुस्कुराते हुए कॉल काट दी।
कुछ ही पलों में कुणाल अपनी फॉर्मल शर्ट, स्लीव्स फोल्ड की हुई और आँखों पर स्टाइलिश सनग्लासेस लगाए वहाँ पहुँचे। उनका रौबदार और अनुशासित व्यक्तित्व हर किसी को खामोश करने के लिए काफ़ी था। उन्होंने एक सरसरी नज़र पूरी भीड़ पर डाली और अपनी गहरी आवाज़ में बोले—
"डिसिप्लिन हमारी पहली और आखिरी प्राथमिकता होगी! अंडमान के जंगलों में कोई भी अपनी हद पार नहीं करेगा। अगर किसी ने भी फील्ड स्टडी के नियमों को तोड़ा, तो उसे तुरंत उसी फ्लाइट से वापस यूनिवर्सिटी भेज दिया जाएगा। इज़ दैट क्लियर?"
" यस सर!" पूरी क्लास ने एक स्वर में जवाब दिया।
कुणाल की नज़रें भीड़ को चीरती हुई सीधे सृष्टि पर जाकर रुक गईं। सृष्टि ने अपनी सनग्लासेस को थोड़ा नीचे खिसकाया और अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से कुणाल को एक नटखट आँख मारी। कुणाल ने बड़ी मुश्किल से अपने चेहरे पर आ रही मुस्कान को दबाया और अपनी गंभीर टोन बनाए रखी।
कुछ ही घंटों बाद, यूनिवर्सिटी के सभी छात्र और प्रोफ़ेसर कुणाल अपनी टीम के साथ फ्लाइट लेकर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर पहुँच चुके थे। वहाँ से उन्हें और उनकी टीम को द्वीप के अंदर घने जंगलों और समुद्र के पास बने एक विशेष गवर्नमेंट रिसर्च रिसॉर्ट में ले जाया गया, जहाँ सबके ठहरने के लिए कॉटेज और टेंट की व्यवस्था की गई थी।
शाम ढलने लगी थी। आसमान पर नारंगी और बैंगनी रंगों की चादर बिछ चुकी थी और बंगाल की खाड़ी की लहरों की आवाज़ दूर से गूँज रही थी।
रिसॉर्ट के सेंट्रल हॉल में सभी स्टूडेंट्स को उनके कमरों और टेंट की चाबियाँ बाँटी जा रही थीं। कुणाल अपने हाथ में एक ऑफिशियल क्लिपबोर्ड लिए खड़े थे, और तभी सृष्टि पर्ची हाथ में लिए उनके ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।
कुणाल ने कागज़ से नज़रें उठाकर सृष्टि के चेहरे को देखा, जहाँ वही पुरानी शैतानी मुस्कान तैर रही थी। उन्होंने फाइल के पीछे से अपनी धीमी और गहरी आवाज़ में फुसफुसाया—
"तुम्हारा कमरा बिल्कुल मेरे कॉटेज के ठीक बगल में है,
मिस शर्मा... अब रात में देखना यह है कि तुम अपनी इस ज़बान को कैसे संभालती हो।"



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