रात के करीब नौ बज चुके थे। अंडमान के उन घने जंगलों से घिरे गवर्नमेंट रिसर्च रिसॉर्ट में चारों तरफ सन्नाटा पसर चुका था, जिसे सिर्फ बंगाल की खाड़ी से उठती लहरों का शोर और हवा में पत्तों की मद्धम सरसराहट ही तोड़ रही थी। आसमान पर तारों की छांव थी और हवा में एक अजीब सा रोमांच घुला हुआ था।
रिसॉर्ट के वीआईपी कॉटेज वाले इलाके में, प्रोफ़ेसर कुणाल मल्होत्रा का कॉटेज नंबर 04 था, और उसके ठीक बगल वाला कॉटेज नंबर 03 सृष्टि को मिला था।

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