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My Best Friend's uncle

सुबह का वक्त था। रायज़ादा हवेली के डाइनिंग हॉल में हल्की-हल्की धूप झरोखों से छनकर लकड़ी की लंबी टेबल पर गिर रही थी। टेबल पर नाश्ते की महक और शाही सन्नाटा—दोनों साथ मौजूद थे।

अनाया, उसका छोटा भाई, मम्मी-पापा, दादी… और नई मेहमान **आर्या**—सब बैठे थे।

लेकिन एक कुर्सी अब भी खाली थी।

वो कुर्सी थी **देवराज सिंह रायज़ादा** की।

अचानक, दूर से सधे हुए, भारी कदमों की आवाज़ आई।

दरवाज़ा खुला—और अंदर दाख़िल हुआ देवराज।

थ्री-पीस चारकोल ग्रे सूट, सफ़ेद शर्ट, गहरे बरगंडी टाई, चमकते काले जूते। बाल पीछे सलीके से सेट, हल्की-सी दाढ़ी, और तीखी स्लेट-ग्रे आँखें, जो मानो किसी की रूह तक उतर जाएं।

वो चलते हुए अपने छोटे भाई पर नज़र डालता है, जो फोन में व्यस्त था।

*"नाश्ते की टेबल पर फोन? आदत बदल ले… वरना मैं बदल दूँगा।"*

आवाज़ धीमी, मगर असर इतना गहरा कि भाई तुरंत फोन साइड में रख देता है।

इसके बाद वो अपनी माँ के पास जाता है, झुककर उनके पैर छूता है और गले लगाता है।

*"कैसी हैं, माँ?"*

*"तेरे बिना घर खाली लगता है, बेटा,"* माँ मुस्कुराकर कहती हैं।

देवराज हल्की मुस्कान के साथ अपनी कुर्सी की तरफ बढ़ता है।

जैसे ही बैठने लगता है, अनाया ने चमकते चेहरे के साथ कहा—

*"Uncle, ये मेरी बेस्ट फ्रेंड आर्या है… अब हमारे साथ ही रहेगी।"*

देवराज की नज़र पहली बार आर्या पर पड़ी—और वो पल जैसे थम गया।

गुलाबी रंग का साधारण सलवार-कुर्ता, खुले रेशमी बाल, और बड़ी-बड़ी बादामी आँखों में झलकती मासूमियत…

वो नज़र हटाना चाहता था, मगर न जाने क्यों हटाई नहीं।

नाश्ते के दौरान भी उसकी निगाहें अनजाने में बार-बार आर्या पर लौट आतीं। बाकी लोग बातें करते रहे, लेकिन देवराज के लिए उस वक्त दुनिया बस एक चेहरा थी—आर्या का।

नाश्ता खत्म होते ही देवराज ने सहज लहज़े में कहा—

*"मैं तुम्हें और आर्या को कॉलेज छोड़ देता हूँ।"*

गाड़ी में माहौल शांत था। देवराज ड्राइव कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें रियर-व्यू मिरर में बार-बार जातीं—जहाँ से वो आर्या के चेहरे की मासूम सी झलक देख पाता।

कॉलेज पहुंचकर भी, जब आर्या भीड़ में खो गई, उसकी आँखें तब तक पीछा करती रहीं जब तक वो नज़रों से ओझल नहीं हो गई।

गाड़ी मोड़ते वक्त उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी… और दिमाग में बस एक नाम—

**आर्या**।

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रात के साढ़े नौ बज रहे थे। हवेली के ड्रॉइंग रूम में बस हल्की-सी लाइट जल रही थी।

आर्या सोफ़े पर बैठी किताब पढ़ रही थी, लेकिन मन कहीं और था।

अनाया शाम को दोस्तों के साथ डिनर के लिए बाहर गई थी और अभी तक लौटी नहीं थी।

हवेली का बाकी हिस्सा लगभग खाली था—मम्मी-पापा अपने कमरे में, दादी सो चुकी थीं।

नीचे का ड्रॉइंग रूम सन्नाटे में डूबा था… तभी पीछे से कदमों की भारी आवाज़ सुनाई दी।

आर्या ने मुड़कर देखा—सीढ़ियों से उतरता हुआ **देवराज सिंह रायज़ादा**।

आज उसने टाई खोल दी थी, लेकिन थ्री-पीस ब्लैक सूट अब भी उसके रुतबे को और भी गहरा बना रहा था। हाथ में व्हिस्की का गिलास, चाल में वही ठहराव।

*"अकेली?"* उसने सोफ़े के पास आकर पूछा।

*"वो… अनाया अपने दोस्तों के साथ गई है,"* आर्या ने धीमे स्वर में जवाब दिया।

*"और तुम? तुम तो उसकी साया जैसी रहती हो न?"*

आर्या ने हल्की-सी मुस्कान दी, *"कभी-कभी अकेले भी रहना अच्छा लगता है।"*

देवराज उसकी इस बात पर कुछ पल चुप रहा, फिर उसके सामने वाली सीट पर बैठ गया।

*"किताब पढ़ती हो?"*

*"हाँ… बचपन से,"* आर्या ने किताब बंद कर दी।

देवराज की नज़र कुछ देर उसके चेहरे पर टिकी रही—मानो उसके शब्द नहीं, बल्कि उसकी आँखें पढ़ रहा हो।

*"तुम्हारे बारे में जितना सुना है… उतना तुम लगती नहीं हो,"* उसने कहा।

*"मतलब?"* आर्या ने भौंहें हल्की-सी चढ़ाईं।

*"मतलब… तुम्हारे अंदर जितनी सादगी है, उतनी ताक़त भी है। दोनों साथ होना… दुर्लभ है।"*

आर्या उसके इस सीधे और गहरे कॉम्प्लिमेंट से कुछ पल चुप हो गई।

कमरे में खामोशी फैल गई, लेकिन वो खामोशी अजीब तरह से भारी नहीं, बल्कि… जुड़ाव वाली थी।

तभी बाहर से गाड़ियों की आवाज़ आई—अनाया लौट आई थी।

देवराज ने गिलास खत्म किया, खड़ा हुआ, और जाते-जाते बस इतना बोला—

*"अच्छा लगा… तुमसे बात करके।"*

आर्या की उंगलियाँ अब भी किताब पर थीं, लेकिन उसका मन किसी

और पन्ने पर अटक गया था—एक ऐसा पन्ना जो उसने कभी खोला ही नहीं था।

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Sakuntala Koiry

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"By day, I crunch numbers. By night, I craft darkness. Meet Sakuntala Koiry , teacher, and dark romance author, where shadows meet seduction." Meri stories meri khud ki likhi hui hai please ise koi copy na kare..

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