## **सीन – हॉस्पिटल की रात**
रात के करीब डेढ़ बज रहे थे।
पूरा फ़्लोर खामोश था, बस मॉनिटर की *बीप-बीप* और बाहर बारिश की हल्की-सी रिमझिम सुनाई दे रही थी।
आर्या करवट नहीं बदल पा रही थी। नींद आँखों पर थी, मगर दिल बेचैन था।
धीरे-धीरे उसने नज़र घुमाई — खिड़की के पास वाली कुर्सी पर देवराज बैठा था।
सिर पीछे टिकाए, आँखें बंद… शायद सोने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन जैसे ही आर्या ने हल्की सी आह भरी, वो तुरंत उठ बैठा।
**देवराज:**
*"दर्द हो रहा है?"*
आर्या ने सिर हिलाया, हल्की मुस्कान दी।
**"नहीं… बस नींद नहीं आ रही।"*
देवराज कुर्सी खिसकाकर उसके पास आ गया।
धीरे से बोला —
**"आराम से सो जाओ, मैं यहीं हूँ।"*
आर्या ने उसकी तरफ़ देखा — आँखों में थकान और जिज्ञासा दोनों थे।
**आर्या:**
*"तुम हमेशा इतना खामोश क्यों रहते हो? कभी अपने बारे में कुछ नहीं कहते…"*
देवराज चुप रहा, जैसे शब्द खोज रहा हो।
फिर धीमे स्वर में बोला:
**"क्योंकि मेरे पास कहने को बहुत कुछ है… लेकिन डर है कि कहीं तुम सुनकर और दूर न हो जाओ।"*
आर्या का दिल हल्का-सा धड़क उठा। उसने हिम्मत जुटाकर पूछा —
**"और अगर मैं कहूँ… कि मुझे तुम्हारा पास रहना अच्छा लगता है?"**
देवराज ने उसकी ओर देखा, उसकी आँखें गहराई से भर आई थीं।
वो झुककर उसके पास बैठ गया।
**"आर्या… जब डॉक्टर ने कहा *इन्फेक्शन है*, उस पल मुझे लगा… अगर तुम्हें कुछ हो गया तो?"**
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
**"मैंने कभी किसी के लिए इतना डर महसूस नहीं किया।"*
आर्या की आँखें नम हो गईं। उसने अपनी कमजोर उँगलियाँ धीरे से उसकी हथेली पर रखीं।
देवराज ने तुरंत पकड़ लीं — कसकर, जैसे छोड़ना ही न हो।
**आर्या:**
*"तो अब डरना बंद करो। मैं यहीं हूँ… और अब जाऊँगी नहीं।"*
कुछ पल दोनों चुप रहे।
कमरे की खामोशी में उनकी साँसों की आवाज़ ही सब कुछ कह रही थी।
देवराज ने उसके माथे पर हल्की-सी चुम्बन दी और फुसफुसाया —
**"बस जल्दी ठीक हो जाओ… उसके बाद मुझे कुछ और नहीं चाहिए।"*
आर्या ने आँखें बंद कर लीं। पहली बार, उसे नींद आई… क्योंकि उसके पास वही था, जिसके बिना अब वो खुद को अधूरा समझने लगी थी।
---
---
### **सीन – डिस्चार्ज **
सुबह की नरम धूप खिड़की से अंदर आ रही थी।
कमरे की सफ़ेद दीवारें उस रोशनी में हल्की सुनहरी लग रही थीं।
आर्या बैड पर बैठी थी — पतली-सी रज़ाई उसके पैरों पर डली थी, हाथ में डिस्चार्ज पेपर थे। उसकी आँखों के नीचे अब भी थकान की हल्की परत थी, लेकिन चेहरे पर आज एक अलग सुकून था… जैसे एक लंबी लड़ाई जीतकर अब घर जाने का वक़्त आ गया हो।
देवराज कमरे के एक कोने में खड़ा था, हाथ में फाइल और कुछ कागज़।
उसका ध्यान हर छोटे-छोटे डिटेल पर था — दवाइयों की लिस्ट, अगली अपॉइंटमेंट का टाइम, डिस्चार्ज पेपर्स पर साइन।
वो डॉक्टर और नर्स से बार-बार पूछ रहा था —
**“ये दवा कब तक देनी होगी? साइड इफेक्ट्स तो नहीं होंगे?
और अगर रात में दर्द बढ़े तो किसे कॉल करना है?”**
नर्स मुस्कुराई और जाते-जाते चुटकी ली —
**“मरीज़ से ज़्यादा तो अटेंडेंट टेंशन ले रहे हैं।”**
देवराज ने बस हल्की-सी मुस्कान दी। लेकिन उसकी आँखें वहीँ आर्या पर टिक गईं।
आर्या ने उसे देखा और धीमे स्वर में कहा —
**“इतनी चिंता करने की ज़रूरत नहीं, मैं अब ठीक हूँ।”**
उसकी आवाज़ में नर्मी थी, लेकिन साथ ही वो जानती थी — उसकी ये चिंता महज़ औपचारिक नहीं थी, ये दिल से थी।
देवराज ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी ओर सीधा देखा।
वो नज़रें… जिनमें रात की सारी बेचैनियाँ, डर और अनकहे जज़्बात छिपे हुए थे।
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
बस मशीनों की धीमी बीप की आवाज़ और खिड़की से आती हवा का सरसराना।
आर्या ने अपनी नज़रें झुका लीं।
वो उस नज़र को ज़्यादा देर तक झेल नहीं पा रही थी।
---
थोड़ी देर बाद बैग पैक हो गया।
आर्या धीरे-धीरे उठने लगी। उसका शरीर अब भी कमजोर था, कदम भारी थे।
उसने सहारे से खड़े होने की कोशिश की, लेकिन एक पल को संतुलन बिगड़ गया।
देवराज तुरंत आगे बढ़ा, उसके पास झुक गया।
उसकी आवाज़ गहरी थी, लेकिन बेहद मुलायम।
**देवराज:**
“इतनी मेहनत क्यों? चलो…”
आर्या ने उसकी तरफ हैरानी से देखा,
**“क्या मतलब?”**
उसके जवाब देने से पहले ही…
देवराज ने एक ही झटके में उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।
आर्या का दिल जैसे एक पल को धड़कना भूल गया।
उसने धीरे से कहा —
**“देवराज! सब देख रहे हैं…”**
वो सही कह रही थी — कमरे के बाहर स्टाफ खड़ा था। कुछ लोग मुस्कुरा रहे थे, कुछ हैरान थे।
देवराज ने उसकी आँखों में देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा —
**“देखने दो… ”**
उसकी आवाज़ में वो दृढ़ता थी, जो आर्या को भीतर तक सुकून देती थी।
वो चाहती तो उसे रोक सकती थी… मगर उसके सीने से लगी हुई उस पल को छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा था।
देवराज बिना किसी परवाह के गलियारे से गुज़रा।
स्टाफ की मुस्कानें उसके पीछे थीं, लेकिन उसकी नज़रें सिर्फ़ आर्या पर थीं।
---
बाहर पहुँचकर उसने उसे बहुत सहेज कर कार की सीट पर बिठाया।
उसका हाथ अब भी उसकी बाँह से छू रहा था।
आर्या ने हल्की आवाज़ में कहा —
**“हमेशा ऐसे ही साथ दोगे?”**
देवराज झुककर उसके माथे पर एक नर्म-सा चुम्बन रखता है।
**“अब सवाल नहीं… सिर्फ़ वादे होंगे।”**
कार धीरे-धीरे हॉस्पि
टल से बाहर निकल पड़ी।
बारिश थम चुकी थी, सड़कों पर पानी की बूंदों में धूप चमक रही थी…
जैसे किसी नए सफ़र का रास्ता चमक उठा हो।
---



Write a comment ...