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My Best Friend's uncle

## **सीन – डिस्चार्ज और घर वापसी**

आर्या ने चलते-चलते धीमे स्वर में कहा —

**“इतना सब करने की ज़रूरत नहीं थी…”**

देवराज उसकी ओर देखता रहा। उसकी आँखों में एक ही बात थी — *“तुम हो तो सब ज़रूरी है।”*

कार जब हवेली पहुँची, तो सबसे पहले दरवाज़े पर अनाया खड़ी मिली। उसकी आँखें पूरी रात रोने की वजह से लाल थीं।

जैसे ही उसने आर्या को देखा, बिना कुछ कहे सीधा दौड़कर गले लग गई।

**“पागल! इतनी बड़ी बात मुझे बताई भी नहीं? मैं तेरी बेस्ट फ्रेंड हूँ या नहीं?”**

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

आर्या ने उसे कसकर पकड़ लिया।

**“मैं सच में ठीक हूँ, अनाया… बस थोड़ा थक गई थी।”**

अनाया की आँखें भर आईं —

**“थक गई थी? तू जानती है, अगर कुछ हो जाता तो मैं…!”**

वो वहीं रुक गई, जैसे शब्द गले में अटक गए हों।

देवराज ये सब दूर खड़ा देख रहा था। उसके लिए ये नया था — आर्या को किसी ने इस तरह अपनी जान से भी बढ़कर चाहा हो।

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## **दिन भर की देखभाल**

अनाया पूरे दिन उसके आसपास रही। कभी सूप बना कर लाती, कभी तकिया ठीक करती, तो कभी कहती —

**“अब तू मेरी स्पेशल पेशन्ट है, समझी? कॉलेज वाली आर्या को अभी छुट्टी मिली है।”**

आर्या मुस्कुराती थी, मगर मन ही मन किसी और की मौजूदगी ढूँढ रही थी।

देवराज सुबह कुछ देर उसके कमरे में रहा, फिर ऑफिस के लिए निकल गया।

बैठक में उसके सामने फ़ाइलें थीं, पर दिमाग बार-बार उस कमरे की ओर भाग रहा था, जहाँ आर्या तकिये से टिककर बैठी थी।

कितनी बार फोन उठाने का मन हुआ, मगर वो रुक जाता।

*“नहीं… मुझे खुद को कंट्रोल करना होगा। हर वक़्त उसके बारे में सोचूँगा तो कमज़ोर हो जाऊँगा।”*

लेकिन चाहे जितनी कोशिश करता, स्लाइड्स पर लिखे शब्दों की जगह बस आर्या का थका चेहरा, उसके माथे की हल्की शिकन और मुस्कुराहट याद आती रही।

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## **डिनर टाइम – आर्या की बेचैनी**

शाम ढल गई। हवेली के बड़े डाइनिंग हॉल में सब इकठ्ठा हुए।

आर्या को अनाया अपने पास बैठा लाई।

सब बातें कर रहे थे, हँस रहे थे, बस आर्या चुपचाप बैठी रही।

उसकी नज़र बार-बार दरवाज़े की ओर उठ जाती।

एक उम्मीद, शायद अगले ही पल देवराज अंदर आ जाए…

मगर वो नहीं आया।

किसी ने गौर नहीं किया — यहाँ तक कि अनाया भी उसकी चुप्पी को *थकान* समझकर बस प्लेट में खाना डालती रही।

आर्या ने सबके सामने खुद को सामान्य दिखाने की पूरी कोशिश की।

**“थोड़ा खा लो…”** अनाया ने कहा।

आर्या ने सिर हिलाकर हल्की मुस्कान दी, पर हर निवाले के साथ उसका गला और भारी होता गया।

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## **रात का सन्नाटा**

रात गहरी हो गई थी। हवेली में सब अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।

आर्या करवट बदलती रही, मगर नींद नहीं आई।

दिल में एक ही सवाल — *“क्यों नहीं आए? क्या इतना भी वक़्त नहीं था मेरे लिए…?”*

आधी रात बीत गई।

करीब 1 बजे अचानक उसकी नींद खुली — जैसे किसी की मौजूदगी का अहसास हो।

उसने धीरे से आँखें खोलीं…

कमरे की हल्की रोशनी में देवराज सामने कुर्सी पर बैठा था।

सिर पीछे टिकाए, आँखें बंद, जैसे घंटों से वहीं बैठा हो।

आर्या कुछ पल बस उसे देखती रही। दिल में गुस्सा भी था, पर उस गुस्से से बड़ा सुकून था —

*“वो आया है… मेरे पास।”*

आर्या ने हल्की आवाज़ में पुकारा —

**“देवराज…”**

देवराज ने तुरंत आँखें खोलीं, जैसे उसकी आवाज़ ही उसकी नींद हो।

उसकी नज़रें सीधे आर्या से टकराईं।

**“जगा दिया क्या?”** आर्या ने धीरे से पूछा।

देवराज बस मुस्कुराया और धीरे से बोला —

**“नींद तो तब आती है जब चिंता ना हो।”**

उन दोनों के बीच वो सन्नाटा था, जिसमें अनकहे शब्द भी चीख रहे थे।

आर्या ने पहली बार बिना झिझक अपनी नज़रें उस पर टिकाए रखीं।

देवराज ने धीमे से कुर्सी आगे खिसकाई, और उसके पास बैठ गया।

उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी —

**“माफ़ करना… शाम को आ नहीं पाया। मगर मैं पूरे दिन… बस तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा।”**

आर्या ने अपनी पलकों को झुका लिया।

दिल में जो शिकायत थी, वो धीरे-धीरे पिघल रही थी।

कमरे में अब सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक और उनके धड़कते दिलों की आवाज़ थी।

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कमरे में हल्की रोशनी थी। बाहर हवेली के आँगन में पेड़ों से गिरती ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी।

आर्या तकिये से टिककर बैठ गई। देवराज उसके पास कुर्सी खींचकर बैठ गया।

कुछ देर दोनों खामोश रहे।

सिर्फ़ दिलों की धड़कन जैसे बातचीत कर रही थी।

आर्या ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा —

**“आपको पता है… शाम को मैं हर पाँच मिनट में दरवाज़े की ओर देख रही थी।”**

उसकी आवाज़ काँप रही थी, मगर आँखें सीधी उसकी आँखों में।

देवराज के चेहरे पर गहरा पछतावा उतर आया।

उसने हल्की साँस खींची —

**“जानता हूँ। और मुझे भी हर मिनट यही लगता रहा कि छोड़ दूँ सबकुछ… बस तुम्हारे पास आ जाऊँ।”**

आर्या की पलकों पर नमी उतर आई।

**“तो फिर आए क्यों नहीं?”**

देवराज ने उसके हाथों को धीरे से थाम लिया।

**“क्योंकि डर था… कहीं मैं अपनी फीलिंग्स पर काबू न रख पाऊँ। ऑफिस में था, मगर हर फ़ाइल के बीच बस तुम दिखती रहीं।”**

आर्या ने हाथ खींचने की कोशिश नहीं की।

उसके गाल पर हल्की-सी लाली आ गई।

कुछ देर सन्नाटा छाया रहा।

देवराज ने झुककर धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा।

**“अब कैसा लग रहा है? बुखार तो नहीं है?”**

आर्या ने आँखें बंद कर लीं।

उस स्पर्श में सिर्फ़ देखभाल नहीं, एक गहरी चाहत थी।

**“आप होते हो तो… दर्द भी कम लगने लगता है।”**

देवराज की उंगलियाँ उसकी हथेलियों पर कस गईं।

उसने बहुत धीमे स्वर में कहा —

**“काश… ये वक़्त थम जाए। बस मैं और तुम।”**

आर्या ने धीरे से उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में वो softness थी, जो उसने पहले कभी किसी को दिखाने की हिम्मत नहीं की थी।

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## **पल जो ठहर गया**

देवराज ने झुककर उसके चेहरे के पास रुक गया।

बहुत पास… इतना कि उसकी साँसें आर्या की साँसों से टकराने लगीं।

**“आर्या… मुझे नहीं पता ये क्या रिश्ता है। पर इतना जानता हूँ कि जब तुम साथ होती हो, तो दुनिया की सारी उलझनें मिट जाती हैं।”**

आर्या की पलकों ने झुककर जवाब दिया, मगर उसके होंठ हल्के-से काँप गए।

उसने फुसफुसाकर कहा —

**“और जब आप दूर होते हो… तो सब कुछ अधूरा लगता है।”**

उनके बीच की सारी दूरी जैसे मिट गई।

देवराज ने उसके हाथ पर अपने होंठ हल्के से रख दिए — कोई जल्दी नहीं, बस एक वादा जैसा।

आर्या की आँखें नम थीं, मगर दिल पूरी तरह भरा हुआ।

उसने पहली बार बिना किसी हिचकिचाहट के कहा —

**“आज अगर आप आते नहीं… तो शायद मैं कभी

माफ़ नहीं करती।”**

देवराज ने गहरी नज़र से उसे देखा।

**“तो अब मुझे कहीं जाने मत देना।”**

कमरा खामोश था, लेकिन उनके दिलों की आवाज़ पूरी हवेली में गूंज रही थी।

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Sakuntala Koiry

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"By day, I crunch numbers. By night, I craft darkness. Meet Sakuntala Koiry , teacher, and dark romance author, where shadows meet seduction." Meri stories meri khud ki likhi hui hai please ise koi copy na kare..

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