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My Best Friend's uncle

तीन दिन बाद आर्या फिर कॉलेज लौट आई थी।

बीमारी से थोड़ी कमजोर सही, लेकिन उसके चेहरे पर फिर वही संजीदगी लौट आई थी। क्लास खत्म होने के बाद, कैंपस के गार्डन में उसे कोई लड़का मिला —

शांत, सौम्य-सा — नाम था **ऋत्विक**।

उसने आर्या से कुछ नहीं पूछा, बस सीधे कहा —

**"मैं तुम्हें काफी टाइम से observe कर रहा हूँ। कोई जल्दी नहीं है, तुम सोचो… जवाब बाद में देना। लेकिन हाँ, मैं serious हूँ।"**

आर्या कुछ नहीं कह सकी। वो सिर्फ़ *"ठीक है"* कहकर वहाँ से निकल गई।

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## **सीन – लौटते वक़्त**

अनाया हमेशा की तरह साथ थी।

कॉलेज से बाहर निकलते ही आर्या ने देखा —

देवराज गाड़ी के पास खड़ा था, कार की डिग्गी बंद कर रहा था।

आर्या की चाल अचानक धीमी हो गई।

अनाया ने मुस्कुराते हुए कहा,

**"ओहो! स्पेशल पिकअप आज? अच्छा है, घर पहुँचने से पहले ही सुरक्षाकवच मिल गया!"**

देवराज ने नजर उठाई और सबसे पहले **आर्या को ऊपर से नीचे तक देखा।**

उसकी नज़र सिर से लेकर जूतों तक सिर्फ़ एक ही सवाल कर रही थी —

**"सब ठीक है न?"**

ना आर्या कुछ बोली, ना देवराज ने।

लेकिन उनके बीच एक ख़ामोश संवाद चल चुका था।

देवराज ने दरवाज़ा खोला।

अनाया पहले सामने वाली सीट पर बैठ गई।

आर्या पीछे बैठी, चुप — जैसे कोई उलझन से भरी किताब हो, जिसका आखिरी पन्ना अधूरा हो।

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गाड़ी चलने लगी।

देवराज ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा — लेकिन **rearview mirror में उसकी नज़र बार-बार सिर्फ़ आर्या पर जाती रही।**

उसकी आँखों में सवाल था, उलझन थी, और कहीं न कहीं **एक हल्की-सी जलन भी**, जिसे वो खुद भी शायद पूरी तरह नहीं समझ पा रहा था।

गाड़ी में कुछ देर सन्नाटा रहा।

तभी अनाया ने बात छेड़ दी —

**"वैसे Arya… ऋत्विक वाला proposal? क्या सोचा तुने?"**

आर्या चौक गई।

उसके होंठ काँपे, **आँखें सीधे देवराज के mirror से टकराईं।**

देवराज ने तुरंत brake नहीं मारा — लेकिन उसकी आँखों में *कुछ रुका*।

उसने एकदम शांत आवाज़ में पूछा —

**"कौन ऋत्विक?"**

अनाया ने चहकते हुए सब कुछ कहना शुरू कर दिया —

**"आज कॉलेज में एक लड़के ने मैडम को propose किया। बड़ा cute-सा था। लेकिन आर्या कुछ बोली ही नहीं, बस चुपचाप सुनती रहीं। वो लड़का बोला — 'जितना टाइम चाहिए, ले लो।'"**

देवराज ने अपनी आँखें बंद कर लीं —

बस एक पल को।

जैसे उसकी रफ्तार में कुछ लड़खड़ा गया हो।

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आर्या पीछे बैठी थी, हाथ में अपनी उंगलियाँ मरोड़ते हुए।

उसने महसूस किया कि देवराज उसे लगातार **mirror से देख रहा है।**

लेकिन उसकी नज़रों में अब सवाल नहीं था — **एक ठहरी हुई खामोशी थी।**

आर्या की साँसें तेज़ हो गईं।

उसने कोशिश की कि बाहर का नज़ारा देखे, लेकिन वो नज़रे पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थीं।

**देवराज का चेहरा अब कठोर था, लेकिन आँखों में एक नरमी अब भी ज़िंदा थी — जैसे कोई कुछ पूछना चाहता हो, लेकिन उसे अधिकार न हो पूछने का।**

आर्या के मन में एक डर बैठने लगा था।

**“क्या वो नाराज़ हैं? या बस… अब कोई फासला आ गया है?”**

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गाड़ी जब हवेली के गेट के पास पहुँची, तो देवराज ने बिना कुछ कहे गाड़ी रोकी।

अनाया उतरी और सीधा अंदर चली गई — उसे अंदाज़ा नहीं था कि कार में इस समय *एक पूरा तूफ़ान सुलग रहा है।*

देवराज ने गाड़ी बंद की।

पीछे की सीट से उसकी आवाज़ आई —

**"कुछ बताना चाहोगी?"**

आर्या का गला सूख गया।

उसने धीरे से कहा —

**"कुछ बताने लायक नहीं है…"**

देवराज कुछ पल चुप रहा, फिर बोला —

**"लेकिन सुनने की आदत है।"**

उसकी आवाज़ में वो softness नहीं थी जो आर्या की तबीयत में पूछते वक़्त होती थी —

अब वहाँ **संयम था, और एक छुपा हुआ हक़**, जो वो जताना नहीं चाहता था।

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आर्या ने धीरे से कहा —

**"आपको क्या फ़र्क पड़ता है…?"**

देवराज कुछ नहीं बोला।

बस दरवाज़ा खोला, बाहर निकला और उसकी साइड का दरवाज़ा भी खोल दिया।

आर्या धीरे से बाहर निकली।

जैसे ही वो निकलने लगी, देवराज ने एकदम धीमे स्वर में कहा —

**"फ़र्क नहीं पड़ता होता… तो आज खुद लेने न आता।"**

आर्या रुक गई।

उसने उसकी आँखों में देखा — वहाँ **कोई बड़ी बात थी, जो कही नहीं गई थी…**

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कॉलेज का कैंपस वहि था

लेकिन आज आर्या के चेहरे पर वो सुकून नहीं था जो पहले होता था।

वो चुपचाप चल रही थी। पास ही अनाया चल रही थी, बक-बक करती हुई —

**"तू फिर avoid कर रही है ऋत्विक को? कमाल है यार!"**

आर्या ने बिना उसकी ओर देखे कहा —

**"Avoid नहीं कर रही… बस, जवाब नहीं है मेरे पास।"**

**"क्यों?"**

**"क्योंकि मेरा दिल किसी और जगह अटका हुआ है…"**

अनाया ने पल भर को रुककर उसकी तरफ देखा —

"तो क्या… उस 'और' ने तुझे अटकने दिया है?"

आर्या चुप रही।

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कॉलेज के गेट से थोड़ी दूरी पर एक SUV आकर रुकी।

बिना हॉर्न दिए, बस खामोशी से।

दरवाज़ा खुला, और देवराज उतरा।

**काले शर्ट और आँखों पर सनग्लासेस**, चेहरे पर वो सख्त लुक — जो किसी को नहीं समझने देता कि उसके भीतर क्या उथल-पुथल मची है।

लेकिन जैसे ही उसकी नज़र आर्या पर पड़ी —

वो पल भर को थम गया।

आर्या के ठीक पास में **ऋत्विक खड़ा था** — हाथ में कुछ कागज़, जैसे कोई नोट्स देना चाहता हो।

देवराज ने देखा —

**ऋत्विक का चेहरा मुस्कुरा रहा था। और आर्या…? उसके चेहरे पर वो 'na-na, haan-haan' वाली उलझन थी।**

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देवराज पास आया, लेकिन उसने आर्या से कुछ नहीं कहा।

बस अनाया से बोला —

**"चलो, तुम्हें लेने आया हूँ।"**

अनाया ने शरारत से देखा —

**"सिर्फ़ मुझे?"**

देवराज ने जवाब दिया —

**"जो आना चाहे, बैठ सकती है। मजबूरी नहीं है।"**

(आवाज़ सख़्त थी, पर छुपे हुए इशारे साफ़ थे)

आर्या ने कुछ नहीं कहा।

लेकिन फिर **ऋत्विक ने हल्के से मुस्कुराकर आर्या से कहा —**

**"कल लाइब्रेरी में बात कर लें? मैं वेट करूँगा।"**

आर्या ने नज़रें चुराते हुए बस सिर हिला दिया।

देवराज के पैर वहीँ जम गए थे।

उसकी उँगलियाँ कस गईं —

**ना उसने कुछ कहा, ना अपनी नज़र हटाई।**

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गाड़ी चल रही थी।

देवराज ड्राइव कर रहा था।

अनाया फ्रंट सीट पर —

और आर्या पीछे अकेली।

आर्या ने देखा — rear view mirror से बार-बार देवराज उसे देख रहा है।

लेकिन आज उसकी नज़रों में **वो नर्मपन नहीं था** —

आज वहाँ **एक सख्ती थी, एक जिद थी, और… एक सवाल जो पूछने की इजाज़त नहीं थी।**

कुछ मिनटों बाद, अचानक देवराज बोला —

**"आजकल कॉलेज में बहुत ‘modern’ लड़के दिखते हैं…"**

(बिल्कुल casually, लेकिन **तीर की तरह सीधा**)

अनाया ने समझा —

मज़ाक कर रहा है।

लेकिन आर्या जानती थी — **ये चोट है।**

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फिर अचानक देवराज ने कहा —

**"तुम्हें ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए जो सिर्फ़ तुम्हारे आसपास इसलिए घूमते हैं क्योंकि तुम दिखने में अच्छी हो।"**

आर्या को जैसे किसी ने चुप्पी तोड़ने पर मजबूर कर दिया।

**"अगर वो इंसान वाकई अच्छा हो तो…?"**

उसने पहली बार साफ़ लहज़े में पूछा।

देवराज ने गाड़ी साइड में रोकी।

ब्रेक थोड़ा तेज़ था।

फिर mirror से उसकी आँखों में देखते हुए कहा —

**"तुम्हारे लिए कौन अच्छा है, ये तुमसे बेहतर शायद कोई जानता हो।"**

आर्या चौंकी।

**"मतलब?"**

देवराज ने सीधा जवाब नहीं दिया।

बस कहा —

**"कुछ लोग silently observe करते हैं। Not because they don’t care… बल्कि इसलिए क्योंकि शायद उन्हें कोई हक़ ही नहीं दिया गया कभी।"**

गाड़ी फिर से चल पड़ी।

अब कार में **सन्नाटा था** —

लेकिन इस बार की खामोशी में **झगड़ा नहीं था, जज़्बात थे**।

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रात को आर्या अपने कमरे में खिड़की के पास बैठी थी।

बार-बार देवराज की बातें उसके कानों में गूंज रही थीं।

**"हक़ नहीं दिया गया कभी…"**

उसका मन बेचैन था।

उसने फोन उठाया।

टाइप किया —

**"कल लाइब्रेरी में मत आना।"**

(ऋत्विक को भेजा — लेकिन दि

ल में देवराज की तस्वीर थी)

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उधर देवराज अपने कमरे की बालकनी से नीचे आँगन की खामोशी देख रहा था।

हाथ में कॉफी का मग था, पर वो बिल्कुल ठंडी हो चुकी थी।

**वो कुछ बोलना चाहता था… लेकिन शायद डरता था कि अगर कह दिया, तो ये रिश्ता बदल जाएगा — हमेशा के लिए।**

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Sakuntala Koiry

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"By day, I crunch numbers. By night, I craft darkness. Meet Sakuntala Koiry , teacher, and dark romance author, where shadows meet seduction." Meri stories meri khud ki likhi hui hai please ise koi copy na kare..

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