रात का सन्नाटा हवेली की ऊँची दीवारों से टकराकर और गहरा हो गया था।
आर्या अब भी खिड़की के पास बैठी थी।फोन उसकी उंगलियों में था, स्क्रीन पर ऋत्विक का चैट खुला हुआ —लेकिन उसकी आँखों के सामने बार-बार सिर्फ़ एक चेहरा आ रहा था।
देवराज।
उसकी आवाज़…उसकी नज़रें…और वो एक लाइन —
“शायद उन्हें कोई हक़ ही नहीं दिया गया कभी…”
आर्या ने आँखें बंद कर लीं।दिल जैसे मान चुका था, मगर दिमाग अब भी डर रहा था।
तभी उसके कमरे के बाहर हल्की-सी दस्तक हुई।
आर्या का दिल तेज़ी से धड़का।
“आ… आइए।”
दरवाज़ा खुला।
देवराज अंदर आया।ब्लैक शर्ट की sleeves मोड़ी हुई थीं, बाल हल्के बिखरे हुए, और चेहरे पर वही ठहरा हुआ सन्नाटा।
लेकिन आज उसकी आँखें अलग थीं।जैसे वो कोई फैसला लेकर आया हो।
कुछ सेकंड तक दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर देवराज धीरे से बोला —
“सोई नहीं अभी तक?”
आर्या हल्का-सा मुस्कुराई।“नींद नहीं आ रही थी।”
देवराज ने कमरे में नज़र घुमाई, फिर उसकी तरफ देखा।
“क्यों? ऋत्विक के बारे में सोच रही थीं?”
सवाल सीधा था।इतना सीधा कि आर्या कुछ पल चुप रह गई।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा —
“अगर सोच रही होती… तो क्या आपको फ़र्क पड़ता?”
देवराज की आँखें उस पर टिक गईं।
वो धीरे-धीरे उसके करीब आया।इतना करीब कि आर्या की साँसें उलझने लगीं।
“तुम सच जानना चाहती हो?”उसकी आवाज़ धीमी थी… मगर अंदर दबा तूफ़ान साफ़ महसूस हो रहा था।
आर्या ने बिना पलक झपकाए उसे देखा।धीरे से सिर हिलाया।
देवराज ने गहरी साँस ली।जैसे सालों से रोकी हुई कोई बात आखिर बाहर आने वाली हो।
“फ़र्क पड़ता है।”
कमरे की हवा जैसे रुक गई।
“इतना पड़ता है कि जब वो तुम्हारे पास खड़ा था… मेरा मन कर रहा था उसे वहीं से हटा दूँ।”
आर्या की धड़कन तेज़ हो गई।
देवराज ने तुरंत नज़रें फेर लीं।जैसे खुद से नाराज़ हो।
“और यही वजह है कि मुझे खुद से डर लगने लगा है।”
आर्या कुछ पल उसे देखती रही।
फिर बहुत धीरे से बोली —
“मुझसे नहीं?”
देवराज की नज़र तुरंत उसकी आँखों से टकराई।
उस पल में कुछ बदल गया।
वो उसके और करीब आया।अब उनके बीच बस कुछ साँसों की दूरी थी।
“तुमसे डरना possible नहीं है, Arya.”
उसका नाम उसके होंठों से निकलकर सीधे आर्या के दिल तक उतरा।
आर्या की उंगलियाँ हल्के से काँपीं।लेकिन इस बार उसने पीछे हटना नहीं चुना।
देवराज ने धीरे से कहा —
“तुम नहीं समझती, Arya… तुम्हारे करीब आना मेरे लिए कितना dangerous है।”
आर्या ने हल्के स्वर में पूछा —“क्यों?”
देवराज हल्का-सा हँसा…लेकिन उस हँसी में थकान थी।
“क्योंकि मैं वो इंसान नहीं हूँ जो तुम्हें पसंद आना चाहिए।”
आर्या का दिल कस गया।
उसने धीरे से पूछा —“और अगर फिर भी आ गए हो?”
देवराज चुप हो गया।
उसकी आँखें बस उसे देखती रहीं।जैसे वो खुद से लड़ते-लड़ते थक चुका हो।
आर्या धीरे से बेड से उतरी।
कमज़ोरी अब भी थी, इसलिए उसका संतुलन हल्का डगमगाया —लेकिन इससे पहले कि वो गिरती, देवराज ने तुरंत उसे पकड़ लिया।
अब वो पूरी तरह उसके करीब थी।
देवराज की बाँह उसके कमर के पीछे थी…और आर्या की उंगलियाँ अनजाने में उसकी शर्ट को पकड़ चुकी थीं।
दोनों कुछ सेकंड वैसे ही खड़े रहे।
साँसें उलझ चुकी थीं।
देवराज ने बहुत धीरे से कहा —
“तुम्हें अंदाज़ा भी है… तुम मेरे साथ क्या कर रही हो?”
आर्या ने ऊपर देखा।
उसकी आवाज़ काँपी —लेकिन शब्द साफ़ थे।
“शायद वही… जो आप मेरे साथ कर रहे हो।”
उस जवाब ने जैसे देवराज के अंदर बचा हुआ आखिरी control भी कमजोर कर दिया।
उसने आँखें बंद कीं…और अपना माथा धीरे से आर्या के माथे से टिका दिया।
ना कोई जल्दबाज़ी।ना कोई सीमा पार करने की कोशिश।
बस एक पल…जहाँ दोनों पहली बार खुलकर एक-दूसरे को महसूस कर रहे थे।
बाहर हवा तेज़ चल रही थी।
खिड़की के पर्दे उड़ रहे थे।कमरे की हल्की पीली रोशनी आर्या के चेहरे पर पड़ रही थी।
देवराज ने बहुत धीमे स्वर में कहा —
“अगर मैं एक कदम और आगे बढ़ा… तो शायद वापस नहीं जा पाऊँगा।”
आर्या की धड़कन इतनी तेज़ थी कि उसे लगा देवराज सुन लेगा।
उसने धीरे से फुसफुसाया —
“तो मत जाइए…”
उस एक लाइन ने दोनों के बीच बची आखिरी दूरी भी तोड़ दी।
देवराज की उंगलियाँ धीरे से आर्या के गाल को छूती हैं।आर्या की आँखें बंद हो जाती हैं।
और फिर…
देवराज उसके माथे पर एक लंबा, ठहरा हुआ चुम्बन रखता है।
इतना नरम…कि आर्या की साँस काँप गई।
कुछ पल बाद देवराज ने अपना माथा उसके माथे से टिकाए ही धीमे स्वर में कहा —
“अब शायद खुद को तुमसे दूर रखना मुश्किल होगा…”
आर्या के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
“तो कोशिश मत कीजिए।”
देवराज की आँखों में पहली बार वो सुकून दिखा…जो शायद उसे सालों से नहीं मिला था।
और उस रात
—हवेली की ऊँची दीवारों के बीच,दो दिलों ने बिना कुछ कहे…एक-दूसरे को अपना मान लिया।



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