हवेली के उस कमरे में अब सिर्फ आर्या की भारी होती साँसें और देवराज की धड़कनों का शोर था। आर्या का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था, जैसे उसकी सारी शक्ति उस एक पल के चरम में बह गई हो। उसका सिर देवराज के मजबूत कंधे पर टिका था, और उसकी आँखें अभी भी बंद थीं।
देवराज ने उसके माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदों को देखा और बहुत प्यार से उन्हें अपनी उंगलियों से पोंछा। उसकी आँखों में एक विजेता का गर्व था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा आर्या के लिए बेपनाह मोहब्बत।

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